छोटी सी चिड़िया

इक  छोटी सी  चिड़िया  बाग़  में  उड़ा  करती  थी,
कभी  इधर तो कभी उधर, बस  युहीं  टहला करती थी

थके  न  कभी  उसके  पंख, हवा में  लहराया करती थी,
कितना  ऊपर,  कितना  नीचे,  कभी  न  परवाह  करती थी

बिना  डरे  किसी  से,  जोर-जोर  फूलों  संग  हँसा  करती थी,
पेड़-पोधे  सब  उसके  दोस्त,  भवरो  से  भी बातें करती थी

इतनी  प्यारी, वो  इतनी  प्यारी,  नदियाँ  भी  उसकी  राह  तकती थी,
गोल गोल घूम, पानी में  जाने  कितने  गीत  गाया करती थी

समज  न  आये  जिसकी  भाषा, उस  सहर  भी  वो  उड़  जाती थी,
उड़ने  की  होगी आदत  उसको, या फिर, कुछ  तो  वो  ढूँढा  करती थी 

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